कागजी डिग्री बनाम जमीनी काबिलियत: भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती
कागजी डिग्री बनाम जमीनी काबिलियत: भारतीय शिक्षा व्यवस्था के उस असंतुलन की पड़ताल जो समाज को भीतर से खोखला कर रहा है क्या किसी व्यक्ति की योग्यता का अंतिम प्रमाण उसकी डिग्री है, या फिर वह ज्ञान, कौशल, अनुशासन और समस्या-समाधान की क्षमता जो उसने वर्षों की मेहनत से अर्जित की है? भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने आज यह सवाल पहले से कहीं अधिक गंभीर होकर खड़ा है। एक ओर हमारे पास ऐसे लाखों युवा हैं जो वर्षों तक NEET, JEE, UPSC, SSC या दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। वे लगातार अध्ययन करते हैं, कठिन विषयों को समझने का प्रयास करते हैं, असफलताओं से गुजरते हैं, अपनी कमियों को पहचानते हैं और बार-बार स्वयं को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर हमारे सामने उच्च शिक्षा की वह व्यवस्था भी है जहाँ कई बार डिग्री हासिल करना और वास्तविक ज्ञान तथा कौशल विकसित करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ बन चुकी हैं। यह कहना गलत होगा कि हर डिग्रीधारी व्यक्ति कम योग्य है या हर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा अत्यधिक सक्षम है। वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। लेकिन समस्या उस मानसिकता में जरूर है...